
अब निभाने को न कोई रीत होगी॥
आपको लो अब न होगा थामना ,
लड़खड़ाऊँ या बहक जाऊं अगर।
अब न होगी आपकी अवमानना ,
टूट जाऊँ या बिखर जाऊं अगर ॥
अब न कोई हार कोई जीत होगी।
अब निभाने को न कोई रीत होगी॥
अब सताएंगी नहीं वो हिचकियाँ,
याद तेरी आँख भर जाए अगर।
अब बुलाएंगी न मेरी सिसकियाँ ,
रूठी रातें जी को तड़पायें अगर॥
अब न जागी रात भीगी सीत होगी।
अब निभाने को न कोई रीत होगी॥

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